एक वो दौर था जब त्योहार के दूसरे दिन जब  माँ और काकी लोग थकी होती थी और  उनका खाना बनाने का मन नहीं होता था तब अक्सर हमारे  घरों मे दाल भात बनता और फिर बासी पूड़ी के साथ खाते थे ,,,,,,,,,सुबह सबेरे बच्चो के हाथ मे नमक लगाकर पूड़ी कट्टा बनाकर  पकड़ा दी जाती थी और वो भी खुशी खुशी दौड़ भाग कर खा पी लेते थे......बच्चो के मजे हो जाते कि खाने के लिए एक जगह बैठना नहीं पडता.....या फिर सफर मे अक्सर आपने देखा होगा ऐसे पूड़ी सब्जी के साथ खाते हुये ........वो गर्मी की छुट्टियों में नानी के घर जाना,अक्सर याद आता है...सबसे ज्यादा याद आता  वो बस  या ट्रेन की आलू पूड़ी, जो माँ अपने साथ बना कर लाती थी जैसे ही डिब्बा खोलती हम सब ललचाई नजरो से देखते ...वो वाला  स्वाद घर मे कभी नहीं आया ...बाबू जी भी इसी इंतजार मे रहते की कब माँ पूंछे  कि भूख तो नहीं लगी किसी को और वो हमसे पहले हाँ बोल देते ....और माँ हंस पड़ती की सबसे छोटे बच्चे को भूख गाड़ी मे बैठते ही लग जाती।.......और फिर माँ सबकी हथेली पर पूड़ी और उसके ऊपर आलू कि सब्जी रखती या फिर आलू पूड़ी  का कट्टा बनाकर पकडाती जाती और हम सब प्रेम से बीच बीच मे अचार का स्वाद लेते हुये खाते कोई भी ये नहीं बोलता कि अच्छा नहीं है .....पहले आम आदमी की न तो इतनी आमदनी होती थी कि वह ट्रेन और होटल का खाना खाये और न ही वह बाहर का खाना पसंद करते थे। जन्नत का स्वाद और सुकून मिलता.........



Comments

Popular posts from this blog

तंदूरी राेटी

मसाला पनीर रेसिपी

साबूदाना की रसीली खिचड़ी व क्रिस्पी परांठा