आम छोटे (अमिया)

जब आम छोटे (अमिया) हो और आँधी मे गिर जाए तो उन्हें सहेजना भी दादी को बखूबी आता था  पर हाँ दादी के साथ घर के सभी सदस्य को लगना पडता था ...किसी की ज़िम्मेदारी सीपी लेकर आम छीलने की तो कोई  अमफरना से बीच से दो हिस्से करता ...तो कुछ लोग हसिया के कोने से आम की गुठली निकालता क्योकि ये काम एक दिन मे ही निबटाने पड़ते है नहीं तो आम खराब हो जाने का डर होता है...आम छीलकर, काट कर फिर उसे कई दिनों तक धूप दिखाई जाती है तब कहीं जाकर आम की खटाई बन पाती है और वो भी थोक मे क्योकि मौसी, बुआ और जो शहर मे रह रहे रिश्तेदार सबके घर भेजने की भी ज़िम्मेदारी रहती है तो कितना भी बन जाए कम पड जाता है .....कोई न कोई रिश्तेदार उलाहना लिए बैठा ही रहता की अबकी खटाई नहीं भेजेव का बात है ......जब आम मे जाली पड़ जाती थी तो उसे मसाला लगाकर रखा जाता जो पूरे साल दाल मे डालने के काम आता और अमिया वाली खटाई को सुखाकर उसका पाउडर या फिर ऐसे ही रख देते थे ..केरेला या फिर कोई और सब्जी मे डालने के काम मे लाया जाता .........पर हाँ इसे बीच बीच मे धूप दिखाना बहुत जरूरी था नहीं तो कीड़े लग जाते है.....दाल वाली खटाई मे को हींग, नमक, सौंफ, जीरा, मंगरैल (कलौंजी), धनिया,लाल मिर्च ,अजवाइन ,मेथी दाना को सरसो का तेल में साजा जाता है .... खटाई में अचार की अपेक्षा नमक ज्यादा डाला जाता है क्योंकि यही सूखी खटाई को नम करता है और हींग खटाई को खराब होने से बचाता है। खटाई में सरसों का तेल इतना प्रयोग करे की खटाई में मसाले अच्छी तरह से चुपड़ जाए भुरभुरा न रहे ....... खटाई चूंकि सूखी ही रहती है इसलिए इसमें तेल अचार की अपेक्षा कम डाला जाता है लेकिन इतना तेल जरूर डालें कि खटाई में गीलापन रहे.... साज कर मिट्टी के बड़े बड़े मटकी मे या फिर चीनी मिट्टी की बरनी में भरकर, ऊपर से मिट्टी का कोशा रखकर फिर कपडे से बांधकर संरक्षित करके वर्षो तक उपयोग करके रख लिया जाता है ...खटाई सालों साल खराब नही होगी और ये जितनी पुरानी होती है उतनी ही स्वादिष्ट लगती है। ये खटाई जितनी पुरानी होती है उतना ही गलकर स्वादिष्ट होती जाती है। 



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