अन्न का सम्मान

 अन्न का सम्मान!

बचपन में जब मां गेहूं, चावल, दालें साफ करने बैठती थी तब हम उनसे यूं ही खेलते थे। कौड़ी जैसे उछाल कर फिर लपक कर पकड़ते थे और तब मां से बहुत तगड़ी डांट पड़ती थी कि ऐसा नही करते हैं! अन्न से खेलने से अन्न का अपमान होता है भगवान जी नाराज हो जाएंगे।

   मां को बचपन से देखती आई थी कि जब वो भोजन बनाती थी तब चावल, दाल का कुछ अंश निकालकर चूल्हे के ऊपर से घुमा कर अग्नि में डाल देती थी फिर बटूली में डालकर भोजन बनाती थी।

  मां की सिखाई आदत आज भी है। गैस चूल्हे पर भोजन बनने के कारण अब अग्नि देव को समर्पित नही होता है लेकिन चूल्हे के ऊपर जरूर रख देती हूं।

  हमारे बुजुर्ग भोजन करने से पहले थाली को नमन करते थे और चावल की एक पिंडी बनाकर पालतू पशुओं के लिए रख देते थे।

   बाबा हमेशा नहाने के बाद लकड़ी की बनी पीढ़ी पर बैठकर भोजन करते थे। मां भी जमीन पर बैठ कर ही भोजन करती हैं। 

   हमारे यहां फसल की खेती शुरू करने से पहले खेत का पूजन होता है, फसल तैयार होने के बाद पूजन करके ही फ़सल को काटने के लिए हंसिया लगती थी। 

जब फसल कटकर घर आ जाती थी तब नवान्न करके नया अन्न खाया जाता है।

 साल में दो बार नवान्न होता है जिसमे बढ़िया सा भोजन बनता है और घर के सारे सद्स्य एक साथ बैठकर भोजन ग्रहण करते हैं और फिर पद आयु अनुसार एक दूसरे के पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

    इसलिए कहते हैं कि.... उतना ही लो थाली में व्यर्थ न जाए नाली में।






जीरा आलू

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